जैसे-जैसे समय आगे बढ़ेगा, भारत में राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रविरोध के बीच का अंतर और अधिक गहरा व स्पष्ट होता जाएगा।

आने वाले कुछ वर्षों में यह संघर्ष केवल वैचारिक न रहकर, प्रत्यक्ष शक्ति-प्रतिस्पर्धा का रूप ले लेगा।
जो लोग सोचते हैं कि उनकी जातीय संख्या, ताक़त या दबदबे के कारण उनका कुछ नहीं बिगड़ सकता—वे अभी भी राष्ट्रविरोधी शक्तियों के सहारे बने हुए हैं। लेकिन सामान्य जनता को आने वाले संकट का आभास हो चुका है और वे एकजुट होकर खड़े होंगे।
यहाँ सबसे प्रमुख रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है। हिन्दू समाज और राष्ट्र की रक्षा के लिए जिस त्याग, समर्पण और सात्विक शक्ति का संचय इस संगठन ने किया है, वह भविष्य में शोध और अध्ययन का विषय बनेगा।

पुनर्निर्मित भारत किस जाति या वर्ग के नेतृत्व में आगे बढ़ेगा—यह प्रश्न गौण है। इतिहास में समय-समय पर विभिन्न वर्गों ने सत्ता संभाली और राष्ट्र को आगे बढ़ाया है। वास्तविकता यह है कि जो भी बलशाली हुआ, वही राष्ट्र के निर्माण में अग्रणी बना।
संघ का ध्येय यह नहीं है कि इतिहास में उसका नाम सबसे ऊपर लिखा जाए, बल्कि यही है कि –
• देश मज़बूत हो,
• धर्म और न्याय की स्थापना हो,
• अन्याय का अंत हो,
• और प्रत्येक व्यक्ति निर्भय होकर, स्वतंत्र जीवन जी सके।
इसके लिए आवश्यक है तप, त्याग, धैर्य, सहनशीलता और निःस्वार्थ पुरुषार्थ।
किसी को केवल जाति, हैसियत या योग्यता के आधार पर महत्व मिलने वाला नहीं है। समाज में बड़ा-छोटा कोई नहीं, सब मिलकर ही संतुलन बनाए रखते हैं।
भारत खड़ा होगा।
बड़े-छोटे का मिथक टूटेगा।
झूठी देशभक्ति और स्वार्थ की राजनीति समाप्त होगी।
और सबसे बड़ा सत्य यह है कि—
भारत का उत्थान और परमवैभव निश्चित है।
अब यह हम सब पर है कि हम उस निर्णायक चरण में तप, संयम और त्याग से अपना योगदान दें।
तस्मात् तपः आचरत्।

