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विजय की तालियों में गुम बलिदानियों की आवाज़
इस दुख की गहराई और भी बढ़ जाती है यह सब उस समय घटित हुआ है जब देश की बागडोर ऐसी सरकार के हाथों में है जो राष्ट्रवाद की धारा को व्यापक स्वर देती है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जब वचनों की गूंज इतनी प्रबल है, तो हमारे शहीदों की रक्षा और सम्मान की दिशा में और क्या कदम उठाए जा सकते हैं।









