विजय की तालियों में गुम बलिदानियों की आवाज़

विजय की तालियों में गुम बलिदानियों की आवाज़

आज एशिया कप में भारत-पाकिस्तान का मुकाबला हुआ—हम खेल में जीत भी गए हों, पर जिस तरह का शर्म-सार अनुभव आज हमें हुआ, वह शर्मनाक है। पहलगाम में जो बलिदानी फिर और बेमौत नष्ट हुए—यह पहली बार नहीं। यह वही घाव है जो बार-बार उभरता है: 1947, 1962, 1971—इतिहास चीख-चीख कर कहता है कि जब हमारे वीरों का रक्त जमीन पर बहा, तब भी हम कई बार तालिका पर, बैठकों में, और शब्दों के खेल में हार गए।

कोई भी संस्था — BCCI हो या ICC — किसी भी परिस्थिति में भारत की संप्रभुता से ऊपर नहीं हो सकती। खेल-मंच और अंतरराष्ट्रीय आयोजन देश की गरिमा से बड़ा नहीं बन सकते। इस दुख की गहराई और भी बढ़ जाती है यह सब उस समय घटित हुआ है जब देश की बागडोर ऐसी सरकार के हाथों में है जो राष्ट्रवाद की धारा को व्यापक स्वर देती है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जब वचनों की गूंज इतनी प्रबल है, तो हमारे शहीदों की रक्षा और सम्मान की दिशा में और क्या कदम उठाए जा सकते हैं।

अब हम कहाँ जाएँ? किस राष्ट्रवादी कंधे पर सिर रखकर अपना मन हल्का करें? उन सैनिकों और यात्रियों के परिजनों के समक्ष हम क्या कहें — जब हमारी चमकदार बातों के बीच उनके अपूरणीय क्षति की पीड़ा बनी रहती है? हम शर्मशार हैं। हमें अपने वीरों के प्रति कृतज्ञता के साथ साथ ईमानदार आत्म-परीक्षण भी चाहिए: क्या वह सब कुछ किया गया जो किया जा सकता था? क्या निर्णय और प्राथमिकताएँ ठीक थीं?

इतिहास के पन्नों में राणा प्रताप और अन्य वीरों के संबंधों पर काव्यात्मक कल्पनाएँ प्रचलित हैं—पर इतिहास और काव्य अलग चीजें हैं। हम कवि की कल्पना का सम्मान करते हैं, पर वास्तविकता को भी नकार नहीं सकते। भावनाएँ चाहे कितनी भी तीखी हों, हमें सत्य को भी देखना होगा और उससे सीख लेनी होगी।

आज मेरे मन में जो दर्द है, वह शब्दों में ढालकर मैंने ऊपर रख दिया है। यह सिर्फ एक विरोध-घोषणा नहीं—यह शोक है, सवाल है और पुकार भी। हमारे शहीदों के प्रति नमन और अपने देश की गरिमा के प्रति संयमित आवाज़ दोनों आवश्यक हैं।